Saturday, July 11, 2009

Manthan

गम नही आज किसी बात का,
न दर्द है किसी वारदात का ।
एक ज़माना हुआ करता था,
जब हर कोई अपना लगता था ।
आज भी कई आस-पास है,
मगर वो अपने कम, पराये ज्यादा लगते है ।
एक एहसास हमेशा रहता है,
कोई तो साथ होत है ।
मगर जब भी मैं आँखें खोल देता हूँ,
ख़ुद को गहरे अंधेरों में पाटा हूँ ।
आज भी यह कशिश मेरा मन टटोल रही है,
लगता है आज भी कोई मुझे ढूँढ रहा है ।
नही !!! वह कोई और नही,
मेरी तन्हाई ही मुझे याद कर रही है ।
जानता हूँ के आज मैं बहुत निराश हूँ,
मगर करू तो क्या करू?
न कल किसीने मुझे संवारा था,
न कल कोई सवारेगा ।
यही सोच-सोचकर मैं लिख रहा हूँ,
अपनी ही दुनिया में मैं ख़ुद को ढूँढ रहा हूँ !!!!

- अभिजीत

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